भारत की संत परम्परा सदैव मानवता के कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक उत्थान की प्रेरणा रही है। इसी गौरवशाली परम्परा में प्रेम प्रकाश पंथ के संस्थापक, आचार्य श्री 1008 सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का नाम अत्यन्त श्रद्धा और सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सत्य, प्रेम, सेवा, सदाचार और ईश्वर-भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उनका व्यक्तित्व केवल एक संत का नहीं, बल्कि समाज सुधारक, युगद्रष्टा, कवि, दार्शनिक और मानवता के उपासक थे।
अमरापुर स्थान जयपुर के संत मोनू राम ने बताया की स्वामी टेऊँराम जी का जन्म 19वीं शताब्दी में सम्वत 1944 में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि शनिवार को 6 जुलाई 1887 को सिंध प्रान्त के खंडू ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम श्री चेलाराम एवं माता का नाम श्री कृष्णा देवी था संत श्री टेऊँराम जी बचपन से ही शांत, सरल, करुणामय और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। सांसारिक आकर्षणों से दूर रहकर उनका मन सत्संग, भजन, ध्यान और आत्मचिंतन में रमता था। 14 वर्ष की किशोरावस्था में ही उन्होंने गुरु श्री आसूराम जी से मंत्रदीक्षा प्राप्त की तथा योग, तप, साधना और आत्मानुभूति के मार्ग पर अग्रसर हुए। लगभग तीस वर्ष की आयु में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लोककल्याण को अपना जीवन ध्येय बना लिया।
स्वामी जी का स्पष्ट मत था कि ईश्वर की प्राप्ति बाहरी आडम्बर, कर्मकाण्ड या जातिगत श्रेष्ठता से नहीं, बल्कि निर्मल हृदय, गुरु-कृपा, नाम-स्मरण और निष्काम मानव सेवा से होती है। उनका अमर संदेश था- "मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।" उन्होंने गुरु महिमा को सर्वोच्च स्थान देते हुए *"ॐ सतनाम साक्षी"* का महामंत्र जन-जन तक पहुँचाया और जीवन को सत्य तथा सदाचार के आधार पर जीने की प्रेरणा दी।
उन्होंने समाज में व्याप्त जाति-पाति, ऊँच-नीच, छुआछूत, अंधविश्वास, साम्प्रदायिकता और सामाजिक कुरीतियों का साहसपूर्वक विरोध किया। सनातन धर्म का बहुत प्रचार प्रसार किया ! उनका विश्वास था कि समस्त मानव जाति एक ही परमात्मा की संतान है, इसलिए सभी धर्मों का मूल उद्देश्य प्रेम, करुणा, सेवा और मानव कल्याण है। उन्होंने प्रेम, समानता, भाईचारे और सहयोग की भावना को समाज में स्थापित करने का सतत प्रयास किया।
स्वामी टेऊँराम जी केवल महान संत ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के साहित्यकार भी थे। उन्होंने सरल, लोकभाषा और जनसामान्य की शैली में अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों, भजनों, दोहों, छन्दों तथा काव्यों की रचना की। उनके प्रमुख ग्रंथों में श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ मे दोहावली, कवितावली, छंदावाली, जैसे भाव विद्यमान है , साथ ही कवित में यमराज नचिकेता कथा, वामन बली कथा, श्रुति संवाद अमर कथा, उलटबासी भजनमाला, अमरपुर वाणी, श्लोकमाला, साक्षी दर्शन आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं में वेदांत, भक्ति, ज्ञान, ईश्वर प्रेमाभक्ति, प्रेम और आत्मबोध का अद्भुत समन्वय मिलता है।
उनकी शिक्षाओं का मूल आधार था- गुरु-भक्ति, नाम-स्मरण, मानव प्रेम, सत्याचरण, निष्काम सेवा, आत्मसंयम और सर्वधर्म समभाव। उन्होंने सिखाया कि मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय प्राप्त कर प्रेम, करुणा और सेवा का जीवन अपनाना चाहिए। उनका जीवन स्वयं इन आदशों का जीवंत उदाहरण था।
ऐसे संत शिरोमणि सतगुरु स्वमी टेऊँराम जी महाराज का महानिर्वाण 55 वर्ष की अल्प आयु में सम्वत 1944 के पुरषोतम जेष्ठ मास में हैदराबाद के अमरापुर दरबार में हुआ
स्वामी टेऊँराम जी द्वारा स्थापित प्रेम प्रकाश पंथ आज भी विश्वभर में प्रेम, सेवा, संस्कार, शिक्षा, आध्यात्मिक जागरण और मानव कल्याण के कार्यों में निरंतर सक्रिय है। श्री अमरापुर स्थान के माध्यम से सत्संग, भजन, बाल संस्कार शिविर, सेवा कार्य तथा आध्यात्मिक साहित्य का प्रचार-प्रसार उनकी दिव्य परम्परा को आगे बढ़ा रहा है।
"प्रेम ही परम धर्म है, सेवा ही सर्वोच्च साधना है और मानवता ही ईश्वर तक पहुँचने का सरलतम मार्ग है।" यही सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के जीवन और संदेश का शाश्वत सार है ! शत शत नमन कोटि कोटि वंदन
