मामला उन भाई-बहनों से जुड़ा था, जिन्हें अपने पिता से कृषि भूमि विरासत में मिली थी। इनमें से कुछ उत्तराधिकारियों ने अपने हिस्से की जमीन तीसरे पक्ष को बेच दी। इस बिक्री का परिवार के एक अन्य उत्तराधिकारी ने विरोध करते हुए अपने अधिकार का दावा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के फैसलों को बरकरार रखते हुए बिक्री को चुनौती देने वाले उत्तराधिकारी के पक्ष को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि धारा 22 का उद्देश्य उत्तराधिकारियों के बीच पहले खरीद का अवसर उपलब्ध कराना है।
क्या कहती है धारा 22?
धारा 22 के अनुसार, जब किसी मृतक की संपत्ति दो या अधिक Class-1 उत्तराधिकारियों को विरासत में मिलती है और उनमें से कोई अपना हिस्सा हस्तांतरित करना चाहता है, तो अन्य सह-उत्तराधिकारियों को उस हिस्से को खरीदने का प्राथमिक अधिकार मिलता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 22 जमीन के हस्तांतरण को नियंत्रित करने वाला सामान्य कानून नहीं है, बल्कि उत्तराधिकार से संबंधित प्रावधान है। इसलिए कृषि भूमि पर इसके लागू होने में संसद की विधायी शक्ति को लेकर कोई संवैधानिक बाधा नहीं है।
अब क्या होगा?
फैसले का व्यावहारिक अर्थ यह है कि विरासत में मिली कृषि भूमि में अपना हिस्सा बेचने से पहले संबंधित Class-1 सह-उत्तराधिकारियों को खरीद का अवसर देना होगा। यदि वे निर्धारित शर्तों पर उस हिस्से को खरीदने के लिए तैयार नहीं होते हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार बाहरी व्यक्ति को बिक्री की जा सकती है।
यह फैसला उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके बीच कृषि भूमि का उत्तराधिकार बंटा हुआ है और कोई सह-उत्तराधिकारी अपना हिस्सा किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है।
नोट: संपत्ति विवादों में धारा 22 की लागू होने की स्थिति मामले के तथ्यों, उत्तराधिकार की प्रकृति और संबंधित राज्य के भूमि-कानूनों पर भी निर्भर हो सकती है।

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