नई दिल्ली,सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या किसी के छूने से भगवान अपवित्र हो सकते हैं और क्या केवल लिंग या जन्म के आधार पर किसी भक्त को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।
क्या है मामला?
सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है। इसी मान्यता के आधार पर वर्षों से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक रही है, जिसे लेकर विवाद चला आ रहा है।
पहले क्या हुआ था?
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसके बाद देशभर में इस मुद्दे पर समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिले। बाद में इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं भी दाखिल की गईं।
सुनवाई में क्या तर्क आए?
अदालत में मंदिर पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि भगवान अयप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं, इसलिए वहां की परंपराएं अलग हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए।
बड़ा मुद्दा
यह मामला केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि:
संविधान में समानता का अधिकार
धार्मिक स्वतंत्रता
परंपरा और आधुनिक कानून
जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष
सबरीमाला विवाद देश में आस्था और कानून के बीच संतुलन का बड़ा उदाहरण बन चुका है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो इस बहस को नई दिशा दे सकता है।
