कटक। उड़ीसा उच्च न्यायालय ने सूचना का अधिकार (RTI) कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सूचना आयोग के आदेश पर सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने कहा है कि किसी आवेदक को भविष्य में आरटीआई आवेदन करने से प्रतिबंधित करना prima facie उचित नहीं प्रतीत होता।माननीय न्यायमूर्ति आर.के. पट्टनायक की एकल पीठ ने यह टिप्पणी चित्तरंजन सेठी बनाम उड़ीसा सूचना आयोग व अन्य मामले की सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता ने सूचना आयोग के 13 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अपीलें खारिज करते हुए उन्हें एक वर्ष तक कोई भी आरटीआई आवेदन दायर करने से रोक दिया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि सूचना आयोग का आदेश अस्पष्ट (क्रिप्टिक) है और बिना उचित विचार किए सभी आवेदनों को दोहराव (repetitive) बताकर खारिज कर दिया गया। यह भी कहा गया कि कुछ सूचनाएँ अधूरी दी गईं और आयोग को आवेदक को भविष्य के लिए प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं है।
वहीं, सूचना आयोग और राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने आदेश का समर्थन किया और कहा कि लगातार एक जैसी सूचनाएँ मांगे जाने के कारण यह कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि आरटीआई आवेदक पर एक वर्ष का प्रतिबंध लगाने का निर्णय हस्तक्षेप योग्य हो सकता है। मामले में आगे की सुनवाई जारी है।
यह आदेश आरटीआई कानून के तहत नागरिकों के अधिकारों और सूचना आयोग की शक्तियों की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
