दलित अधिकार केंद्र के तत्वावधान में टहला, जिला अलवर में हुआ आयोजन
अलवर। दलित अधिकार केंद्र के तत्वावधान में सामुदायिक भवन, कस्बा टहला (जिला अलवर) में एक दिवसीय जिला स्तरीय महिला समागम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र के जिला समन्वयक शैलेष गौतम ने किया। उन्होंने कहा कि दलित महिलाओं के सामने आज भी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक चुनौतियाँ मौजूद हैं। उन पर होने वाले अत्याचार, भेदभाव और शोषण न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि संवैधानिक मूल्यों के भी विपरीत है। ऐसे आयोजनों से महिलाएं अपने अधिकारों को समझकर न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ा सकती हैं। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा महिलाओं को दिए गए संवैधानिक अधिकारों को याद दिलाते हुए कहा कि शिक्षा, स्वरोजगार और संगठन ही सशक्तिकरण की राह हैं।
केंद्र के वित्त अधिकारी मुकेश मेहरा ने संस्था की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि दलित अधिकार केंद्र पिछले दो दशकों से राजस्थान में दलितों, महिलाओं और बच्चों के मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए सक्रिय है। उन्होंने कहा कि संगठन का उद्देश्य छुआछूत और जातिगत भेदभाव को समाप्त कर समाज में समानता, सम्मान और स्वाभिमान की स्थापना करना है।
दलित महिला मंच की राज्य समन्वयक कश्मीरा सिंह ने कहा कि दलित महिलाएं जाति, वर्ग और लिंग आधारित भेदभाव की कई परतों से जूझती हैं। शिक्षा और नेतृत्व विकास उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने माता सावित्रीबाई फुले के योगदान को याद करते हुए कहा कि वर्तमान पीढ़ी की महिलाएं भी उनके विचारों से प्रेरणा लेकर नेतृत्व की भूमिका निभा सकती हैं।
एडवोकेट सुनीता बैरवा (जिला समन्वयक, दौसा) ने दलित महिलाओं के कानूनी अधिकारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने पोस एक्ट, एससी-एसटी एक्ट, पोक्सो एक्ट, एससी-एसटी डेवलपमेंट फंड एक्ट 2022 और महिला अधिकारों से जुड़े प्रावधानों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कानून तभी सशक्त हैं जब समाज उन्हें जानता और प्रयोग करता है।
भीम सेना के शेरसिंह बौद्ध ने कहा कि दलित समाज का आंतरिक बिखराव उसकी प्रगति में बाधा है। संगठित होकर ही समाज अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा कर सकता है।
सामाजिक कार्यकर्ता जगदीश वर्मा ने कहा कि भारतीय समाज में महिलाओं पर ऐतिहासिक रूप से थोपी गई कुप्रथाओं का अंत संविधान ने किया है। महिलाओं की समानता और अधिकारों की रक्षा ही लोकतांत्रिक समाज की असली नींव है। उन्होंने दलित अधिकार केंद्र के संस्थापक पॉल मेनरोड के योगदान को भी याद किया।
कार्यक्रम में रचना देवी बैरवा, श्रवण कुमार मेघवाल, मुरारीलाल बैरवा, राजेंद्र, मंजू बैरवा, ओमप्रकाश, गोपाल महावर, नवल, कजोड़, अजनेश सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर बल दिया।
भवदीय,
शैलेष गौतम
जिला समन्वयक, दलित अधिकार केंद्र
जिला अलवर
मो.: 9549099884
