न्यायपालिका में पारदर्शिता और सामाजिक विविधता की कमी : एक गंभीर प्रश्न

न्यायपालिका में पारदर्शिता और सामाजिक विविधता की कमी : एक गंभीर प्रश्न
भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे बड़ा और मजबूत माना जाता है। लेकिन लोकतंत्र की सफलता केवल संसद या कार्यपालिका पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि न्यायपालिका पर भी उतनी ही निर्भर है। न्यायपालिका को लोकतंत्र का "अंतिम रक्षक" कहा जाता है, क्योंकि यही संस्था नागरिकों के अधिकारों और संविधान की गरिमा की रक्षा करती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से न्यायपालिका, खासकर सुप्रीम कोर्ट के कॉलिजियम सिस्टम को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

कॉलिजियम सिस्टम और पारदर्शिता की कमी

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलिजियम सिस्टम के तहत होती है। इस सिस्टम में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश मिलकर नियुक्तियों की सिफारिश करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी सबसे बड़ी चिंता है। यह तय करने का कोई स्पष्ट नियम नहीं होता कि कौन सा उम्मीदवार चुना जाएगा और कौन बाहर रह जाएगा। निर्णय अक्सर बंद कमरों में लिए जाते हैं, जिनके पीछे का तर्क जनता के सामने नहीं आता। इससे आम नागरिकों और यहां तक कि विधि विशेषज्ञों के बीच भी संदेह और अविश्वास की भावना पैदा होती है।

सामाजिक विविधता का अभाव

न्यायपालिका में सामाजिक विविधता का भी गहरा अभाव दिखाई देता है। आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के न्यायाधीशों की संख्या बेहद कम है। भारत की आबादी में इन वर्गों की बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद उनका प्रतिनिधित्व न्यायपालिका में नगण्य है। यह स्थिति केवल सामाजिक असमानता को बढ़ाती है बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती है।

महिलाओं की भागीदारी पर सवाल

महिलाओं की संख्या न्यायपालिका में बहुत कम है। सुप्रीम कोर्ट में अब तक केवल कुछ ही महिला जज नियुक्त हुई हैं। यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों और लैंगिक समानता की भावना के विपरीत है। जब तक न्यायपालिका में महिलाओं की बराबर भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक न्यायिक व्यवस्था को समाज के सभी वर्गों का सही प्रतिनिधित्व करने वाला नहीं कहा जा सकता।

पक्षपात और ‘एलीट’ वर्ग का वर्चस्व

आलोचकों का कहना है कि कॉलिजियम सिस्टम ने न्यायपालिका में एक तरह का एलीट क्लब बना दिया है। इसमें वही लोग आगे आते हैं जिनका पारिवारिक पृष्ठभूमि मजबूत है, जो पहले से वकालत या न्यायपालिका से जुड़े हुए परिवार से आते हैं। इससे सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिभाशाली वकीलों और न्यायविदों को अवसर कम मिल पाते हैं।

विश्वसनीयता पर संकट

कॉलिजियम की यह अपारदर्शी और असमान व्यवस्था जनता के बीच न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब जनता की न्यायपालिका पर पूरी आस्था हो। लेकिन यदि नियुक्तियों में पारदर्शिता न हो और समाज के बड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व न मिले, तो यह भरोसा कमजोर पड़ सकता है।

समाधान क्या हो सकते हैं?

  1. पारदर्शी प्रणाली – न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया होनी चाहिए।
  2. आरक्षण जैसी व्यवस्था – सामाजिक विविधता बढ़ाने के लिए SC, ST, OBC और महिलाओं को पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
  3. जवाबदेही तय हो – कॉलिजियम अपने निर्णयों का स्पष्ट कारण सार्वजनिक करे।
  4. संविधान सम्मत सुधार – संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका मिलकर नियुक्ति प्रक्रिया को सुधारें ताकि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो।

भारत की न्यायपालिका केवल संविधान की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा स्तंभ है। यदि इस स्तंभ में पारदर्शिता और सामाजिक विविधता का अभाव रहेगा, तो न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनता का विश्वास दोनों कमजोर पड़ेंगे
इसलिए ज़रूरी है कि न्यायपालिका अपने भीतर सुधार की पहल करे और ऐसा तंत्र विकसित हो, जिससे हर वर्ग को बराबरी का प्रतिनिधित्व मिले और जनता का भरोसा न्यायपालिका पर कायम रहे।

Tara Chand Khoydawal

संस्थापक:- मजदूर विकास फाउंडेशन,संपादक:- प्रगति न्यूज़,लेखक, न्यूज़ के लिए सम्पर्क करें 8503000882

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